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भारतीय लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता राजेश तलवार को नॉटिंघम विश्वविद्यालय के अलुमनाई पुरस्कार से सम्मानित किया गया

  नई दिल्ली:  सुप्रसिद्ध भारतीय लेखक और मानवाधिकार अधिवक्ता  राजेश तलवार  को हाल ही में  यूनिवर्सिटी ऑफ नॉटिंघम  की ओर से  Alumni Laureate Award  से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार विश्वविद्यालय के उन पूर्व छात्रों को दिया जाता है जिन्होंने अपने पेशे, समाज और सामाजिक सरोकारों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। राजेश तलवार ने वर्ष 1996-97 में ब्रिटिश चेवेनिंग स्कॉलर के रूप में  नॉटिंघम विश्वविद्यालय  से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून में एलएलएम की पढ़ाई की थी। बीते दो दशकों में उन्होंने  संयुक्त राष्ट्र  के साथ  कोसोवो, सोमालिया, अफगानिस्तान, केन्या, ईस्ट तिमोर और लाइबेरिया  जैसे देशों में प्रमुख पदों पर कार्य किया है। कोसोवो मिशन में वह  मानवाधिकार सलाहकार पैनल के सचिवालय के अध्यक्ष  भी रहे। कानून की पृष्ठभूमि से आने वाले तलवार ने अब तक  42 पुस्तकें  लिखी हैं, जिनमें मानवाधिकार, सामाजिक मुद्दे, बच्चों की कहानियाँ और नाटक शामिल हैं। उनकी चर्चित किताबों में  The Third Sex and Human Rights ,  C...

नेपाल में ग्यानेंद्र शाह की रैली में योगी आदित्यनाथ का पोस्टर क्यों चर्चा का विषय बन गया?


नेपाल के पूर्व राजा ग्यानेंद्र शाह के हालिया काठमांडू दौरे के दौरान एक असामान्य चीज ने सबका ध्यान खींचा — उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पोस्टर।

नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों में योगी का पोस्टर विवाद का विषय बन गया। बीजेपी नेता योगी आदित्यनाथ को नेपाल के निरंकुश राजशाही का समर्थक माना जाता है, और ग्यानेंद्र की इस रैली को केपी शर्मा ओली सरकार के खिलाफ उनकी सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

ओली के समर्थकों ने इसे भारत द्वारा ग्यानेंद्र के समर्थन का संकेत बताया, जिससे रैली की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे। वहीं, ग्यानेंद्र समर्थकों ने दावा किया कि योगी का पोस्टर जानबूझकर लगाया गया था और इसे ओली सरकार की साजिश करार दिया।

रैली के आयोजकों ने सफाई देते हुए कहा कि योगी आदित्यनाथ के पोस्टर लगाने की न तो कोई आधिकारिक अनुमति थी, न ही उन्हें इसकी जानकारी थी। आयोजकों का निर्देश केवल राष्ट्रीय ध्वज और ग्यानेंद्र के चित्र के उपयोग तक सीमित था।

पूर्व मंत्री और राजशाही समर्थक दीपक ग्यावली ने कहा, "हम इतने कमजोर नहीं हैं कि हमें अपनी रैली में किसी विदेशी का फोटो लगाना पड़े।" उन्होंने आगे कहा कि कम्युनिस्ट पार्टियां भी अपने कार्यालयों में मार्क्स, लेनिन और माओ की तस्वीरें लगाती हैं, तो फिर इसे मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है?

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